CM Dhami Flags Off Kailash Mansarovar Yatra From Tanakpur; First Batch Departs

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी टनकपुर से कैलाश मानसरोवर यात्रा के पहले दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना करते हुए।

करीब पांच साल बाद उत्तराखंड के टनकपुर मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा का शुभारंभ हो गया। रविवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शारदा पर्यटक आवास गृह से पहले जत्थे को हरी झंडी दिखाकर अगले पड़ाव धारचूला के लिए रवाना किया। यह दल 4 जुलाई को दिल्ली से र

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इस मौके पर मुख्यमंत्री ने श्रद्धालुओं का रुद्राक्ष माला और शिव पटका पहनाकर स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। उन्होंने यात्रियों से पूरी यात्रा के दौरान धैर्य, अनुशासन और सावधानी बरतने की अपील की।

रवानगी के समय पूरे क्षेत्र में ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयघोष गूंजते रहे। श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के उत्साह के बीच उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और अतिथि सत्कार की परंपरा भी देखने को मिली।

पहले तस्वीरें देखिए…

टनकपुर में कैलाश मानसरोवर यात्रा के पहले दल का पारंपरिक छोलिया नृत्य और ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत किया गया।

टनकपुर में कैलाश मानसरोवर यात्रा के पहले दल का पारंपरिक छोलिया नृत्य और ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत किया गया।

टनकपुर में कैलाश मानसरोवर यात्रा के पहले दल के श्रद्धालुओं का इस तरह तिलक लगाकर पारंपरिक स्वागत हुआ।

टनकपुर में कैलाश मानसरोवर यात्रा के पहले दल के श्रद्धालुओं का इस तरह तिलक लगाकर पारंपरिक स्वागत हुआ।

टनकपुर में शनिवार को सांस्कृतिक संध्या के दौरान लोक कलाकारों के साथ थिरकते श्रद्धालु।

टनकपुर में शनिवार को सांस्कृतिक संध्या के दौरान लोक कलाकारों के साथ थिरकते श्रद्धालु।

टनकपुर में कैलाश मानसरोवर यात्रा के पहले दल के श्रद्धालु स्वागत करते मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी।

टनकपुर में कैलाश मानसरोवर यात्रा के पहले दल के श्रद्धालु स्वागत करते मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी।

सीएम धामी ने श्रद्धालु को शिव पटका और रुद्राक्ष की माला पहनाई।

सीएम धामी ने श्रद्धालु को शिव पटका और रुद्राक्ष की माला पहनाई।

पारंपरिक तरीके से हुआ स्वागत

पहला जत्था शनिवार शाम टनकपुर पहुंचा था। यहां फूल-मालाओं, पारंपरिक छोलिया नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ यात्रियों का स्वागत किया गया। सांस्कृतिक संध्या में उत्तराखंड की लोक परंपराओं की भी प्रस्तुति दी गई।

टनकपुर मार्ग से यात्रा संचालन होने से चम्पावत और आसपास के सीमांत क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है। स्थानीय होटल, परिवहन, व्यापार, हस्तशिल्प और छोटे कारोबारियों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा सीमांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगी।

टनकपुर से कैलाश मानसरोवर यात्रा के अगले पड़ाव के लिए वाहन से रवाना होते पहले दल के श्रद्धालु।

टनकपुर से कैलाश मानसरोवर यात्रा के अगले पड़ाव के लिए वाहन से रवाना होते पहले दल के श्रद्धालु।

पहले जत्थे में 49 यात्री शामिल

पहले जत्थे में एक चिकित्सक सहित कुल 49 तीर्थयात्री हैं। इनमें 34 पुरुष और 15 महिलाएं शामिल हैं, जो देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे हैं। यात्रियों ने सुरक्षा, आवास, चिकित्सा और अन्य व्यवस्थाओं पर संतोष जताया।

इस वर्ष लिपुलेख मार्ग से कुल 10 दलों में 500 श्रद्धालु कैलाश मानसरोवर यात्रा करेंगे। प्रत्येक दल में 50 यात्री शामिल हैं। भारत और चीन की ओर सड़क संपर्क विकसित होने के बाद अब यात्रियों को केवल करीब 38 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी होगी, जबकि पहले 60 किलोमीटर से अधिक ट्रेक करना पड़ता था। इससे यात्रा पहले की तुलना में अधिक सुगम और सुविधाजनक हो गई है।

तिब्बत में स्थित कैलाश पर्वत, हिंदू धर्म में कैलाश मानसरोवर की यात्रा को सबसे पवित्र माना गया है।

तिब्बत में स्थित कैलाश पर्वत, हिंदू धर्म में कैलाश मानसरोवर की यात्रा को सबसे पवित्र माना गया है।

गुंजी में होगी मेडिकल जांच

टनकपुर से रवाना होने के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा का पहला दल पिथौरागढ़ जिले में धारचूला पहुंचेगा। यहां कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) और जिला प्रशासन ने भोजन, आवास, सुरक्षा और स्वास्थ्य समेत सभी व्यवस्थाएं की हैं। आज रात धारचूला में विश्राम के बाद 6 जुलाई को दल गुंजी पहुंचेगा।

यहां सभी यात्रियों की अनिवार्य मेडिकल जांच होगी और ऊंचाई वाले क्षेत्र में बरती जाने वाली सावधानियों की जानकारी दी जाएगी। 7 जुलाई को भी दल गुंजी में रुकेगा। 8 जुलाई को नाभीढांग और 10 जुलाई को लिपुलेख दर्रे से होकर तिब्बत (चीन) में प्रवेश करेगा। 15 जुलाई को कैलाश पर्वत की परिक्रमा पूरी होने के बाद 18 जुलाई को पहला दल भारत लौटकर बूंदी पहुंचेगा।

यात्रा को देखते हुए सीमांत जिले में स्थित नाभीढांग में भी चहल-पहल तेज।

यात्रा को देखते हुए सीमांत जिले में स्थित नाभीढांग में भी चहल-पहल तेज।

लिपुलेख तक वाहन जाएंगे

धन सिंह बिष्ट के अनुसार यात्रियों को लिपुलेख दर्रे तक मैक्स, बोलेरो और कैंपर वाहनों से पहुंचाया जाएगा। वहां से करीब 200 मीटर पैदल चलने के बाद चीनी प्रशासन की ओर से उपलब्ध कराए गए वाहनों से आगे की यात्रा होगी। गुंजी और नाभीढांग में डॉक्टरों, ऑक्सीजन और जरूरी चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था की गई है। पूरी यात्रा के दौरान सुरक्षा की जिम्मेदारी आईटीबीपी संभालेगी।

अब कितना आसान हुआ सफर

इस बार कैलाश मानसरोवर यात्रा की कुल दूरी 1738 किलोमीटर होगी। इसमें लगभग 1690 किलोमीटर यात्रा वाहन से और सिर्फ 38 किलोमीटर पैदल ट्रेक रहेगा।

साल 2019 से पहले यात्रियों को धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक 60 किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलना पड़ता था। रास्ते में ऑक्सीजन की कमी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यात्रा काफी चुनौतीपूर्ण होती थी।

अब भारत और चीन दोनों तरफ सड़क बनने के बाद यह यात्रा काफी आसान हो गई है। सीमावर्ती क्षेत्र तक वाहन पहुंचने लगे हैं, जिससे बुजुर्ग और पहली बार यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह यात्रा पहले की तुलना में ज्यादा सुलभ हो गई है।

6 साल बाद फिर शुरू हुई यात्रा

कैलाश मानसरोवर यात्रा वर्ष 2020 से बंद थी। पहले कोरोना महामारी और बाद में भारत-चीन सीमा पर पूर्वी लद्दाख के गलवान क्षेत्र में सैन्य तनाव के कारण लगातार छह वर्षों तक यात्रा का संचालन नहीं हो सका। दोनों देशों के बीच सहमति बनने के बाद इस वर्ष यात्रा दोबारा शुरू हुई है। उत्तराखंड के लिपुलेख मार्ग से जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए टनकपुर पहला प्रमुख पड़ाव है, जहां से यात्री पिथौरागढ़, धारचूला और गुंजी होते हुए लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर पहुंचेंगे। इस बार यात्रा के दो मार्ग तय किए गए हैं- उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा और सिक्किम का नाथूला दर्रा।

क्यों खास है इस साल की यात्रा

इस साल की कैलाश मानसरोवर यात्रा धार्मिक दृष्टि से भी बेहद खास मानी जा रही है। 60 वर्षों बाद अग्नि अश्व वर्ष का दुर्लभ योग बन रहा है, जिसे हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण समय माना जाता है।

तिब्बती ज्योतिष दौलत रायपा के अनुसार यह 60 साल के चक्र का विशेष वर्ष होता है। मान्यता है कि इस वर्ष की गई एक परिक्रमा का फल सामान्य वर्षों की 12 परिक्रमा के बराबर होता है।

इसी वजह से इस बार देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से श्रद्धालुओं के इस यात्रा में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

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