रंग मल्हार में 150 साल पुराने संदूक पर हुई चित्रकारी:100 से अधिक चित्रकारों ने कैनवास की जगह संदूक और पेटी को बनाया रंगीन, दिए गई संदेश

Actionpunjab
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राजस्थान ललित कला अकादमी में रविवार को आयोजित 17वें रंग मल्हार में इस बार कैनवास की जगह संदूक कलाकारों की कल्पनाओं का माध्यम बना। जयपुर और आसपास के क्षेत्रों से आए 100 से ज्यादा चित्रकारों ने लगभग 150 वर्ष पुराने पारंपरिक संदूकों से लेकर आधुनिक डिजाइन के संदूकों पर अपनी रचनात्मकता के रंग बिखेरे। कलाकारों ने इन संदूकों पर संस्कृति, विरासत, स्मृतियां, प्रकृति, पर्यावरण और सामाजिक सरोकारों को अपनी विशिष्ट शैली में उकेरा। रंग मल्हार में इस बार संदूक केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि परंपरा, स्मृतियों, संस्कृति, समृद्धि और सामाजिक संदेशों का जीवंत प्रतीक बन गया। कलाकारों ने अपनी कल्पनाओं के माध्यम से यह संदेश दिया कि विरासत को सहेजना और प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहना आज भी उतना ही आवश्यक है, जितना कभी हुआ करता था। 17 साल से चित्रकार करते हैं कला अनुष्ठान रंग मल्हार के संयोजक एवं वरिष्ठ चित्रकार विद्यासागर उपाध्याय ने बताया कि यह आयोजन वर्ष 2010 से लगातार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल कला सृजन नहीं, बल्कि राजस्थान में अच्छी बारिश, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करना भी है। उन्होंने कहा कि हर वर्ष कलाकारों को कैनवास की जगह किसी अलग वस्तु पर चित्रांकन कराया जाता है, जिससे कला का दायरा भी बढ़ता है और उस वस्तु के प्रति लोगों में नई संवेदना भी जागृत होती है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष ‘संदूक’ को इसलिए चुना गया, क्योंकि यह धीरे-धीरे घरों से गायब होती जा रही एक ऐसी धरोहर है, जो कभी हर परिवार की पहचान हुआ करती थी। रंग मल्हार किसी एक संस्था या कलाकार समूह का आयोजन नहीं है, इसलिए हर कलाकार इससे आत्मीयता के साथ जुड़ता है। इस बार कलाकारों ने अपनी कलाकृतियों के माध्यम से जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत जैसे विषयों पर भी प्रभावी संदेश दिए। यहां देखिए इवेंट के फोटोज
पुराने संदूक समृद्धि और प्रतिष्ठा के प्रतीक वरिष्ठ चित्रकार विनय शर्मा ने बताया कि प्रदर्शनी में करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराने संदूकों से लेकर वर्तमान समय के आधुनिक संदूक तक प्रदर्शित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि पुराने समय में संदूक किसी भी परिवार की समृद्धि और प्रतिष्ठा का प्रतीक हुआ करते थे। जिस घर में जितनी अधिक संदूकें होती थीं, उसे उतना ही संपन्न परिवार माना जाता था। अधिकांश कलाकार लकड़ी और लोहे के पारंपरिक संदूकों पर अपनी कला उकेर रहे हैं। उन्होंने स्वयं अपने कार्य में पुराने समय के संदूक और घड़ी के संरक्षण की परंपरा को चित्रित किया है। उनके अनुसार जिस तरह लोग अपनी घड़ियों और बहुमूल्य वस्तुओं को सहेजकर रखते थे, उसी स्मृति को उन्होंने अपने संदूक के माध्यम से जीवंत किया है। लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों से बनाया बॉक्स युवा चित्रकार देवेंद्र कुमार ने पूरी तरह लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों से एक अनूठा ज्वेलरी बॉक्स तैयार किया। उन्होंने बताया कि उनकी कला की पहचान ही लकड़ी के टुकड़ों से कलाकृतियां बनाना है। रंग मल्हार के प्रत्येक आयोजन में वे इसी माध्यम से अपनी रचनाएं प्रस्तुत करते आए हैं और इस बार भी उन्होंने लकड़ी के टुकड़ों को जोड़कर संदूक को नया कलात्मक रूप दिया। ट्रक चालकों के जीवन को लिखा भगवान भरोसे युवा चित्रकार सौरभ यादव ने ट्रक चालकों के जीवन को अपनी कलाकृति का विषय बनाया। उन्होंने एक पुराने संदूक को सफेद स्प्रे पेंट और एक्रेलिक रंगों से नया स्वरूप दिया तथा कार्डबोर्ड की सहायता से उसे ट्रक जैसी आकृति प्रदान की। संदूक पर बने ट्रक और ‘भगवान भरोसे’ लिखे संदेश के पीछे उन्होंने बताया कि लंबी दूरी तय करने वाले ट्रक चालक अक्सर जोखिम भरी परिस्थितियों में सफर करते हैं। वे अपने साथ एक छोटी पेटी या संदूक रखते हैं, जिसमें उनका पूरा घर समाया होता है। उनकी यह कलाकृति उन मेहनतकश लोगों के संघर्ष और विश्वास को समर्पित है। संदूक पर श्रीनाथजी और पिछवाई शैली वरिष्ठ चित्रकार श्वेत गोयल ने संदूक को पारिवारिक विरासत और स्मृतियों का प्रतीक मानते हुए उस पर श्रीनाथजी और राजस्थान की प्रसिद्ध पिछवाई शैली को अपने विशेष अंदाज में प्रस्तुत किया। उन्होंने लकड़ी के ब्लॉक और कट-आउट का प्रयोग करते हुए पारंपरिक पिछवाई कला को आधुनिक शैली में उकेरा। उनका कहना है कि संदूक हमें अपने माता-पिता और पूर्वजों से मिली अमूल्य धरोहरों की याद दिलाता है, इसलिए उन्होंने अपनी कलाकृति को उसी भाव से तैयार किया।

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