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होली का त्योहार प्रेम और सद्भावना से जुड़ा पर्व है, जिसमें अध्यात्म का अनोखा रूप झलकता है। इस त्योहार को रंग और गुलाल के साथ मानने की परंपरा है। इसके साथ कई पौराणिक कथाएं और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। होली की पूर्व संध्या में होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन वीरवार को पुरानी दाना मंडी में भारत माता मंदिर के समक्ष धूमधाम व श्रद्धापूर्वक किया गया। होलिका की पूजा करने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
मंदिर के पुजारी महिंदर नारायण झा ने बताया कि प्राचीन कथा है कि असुर हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से घोर शत्रुता रखता था। इसने अपनी शक्ति के घमंड में खुद को ईश्वर कहना शुरू कर दिया और घोषणा कर दी कि राज्य में सिर्फ उसी की पूजा की जाएगी। उसने अपने राज्य में यज्ञ करने बंद करवा दिए और भगवान के भक्तों को परेशान करना शुरू कर दिया। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के लाख कहने के बावजूद प्रह्लाद विष्णु की भक्ति करता रहा। असुराधिपति हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने की भी कई बार कोशिश की मगर भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते रहे। असुर राजा की बहन होलिका को भगवान शंकर से ऐसी चादर मिली थी, जिसे ओढ़ने पर अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। होलिका उस चादर को ओढ़कर प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ गई। दैवयोग से चादर उड़कर प्रह्लाद पर आ गई, जिससे प्रह्लाद की जान बच गई और होलिका जल गई। होलिका दहन करके होलिका नामक दुर्भावना का अंत और भगवान द्वारा भक्त की रक्षा का जश्न मनाया जाता है। पुरानी दाना मंडी में होलिका पूजन करते शहरवासी।