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- The Tradition Of Marrying Tulsi And Shaligram, Shaligram Facts, Tulsi Vivah On 1st November, Significance Of Tulsi Puja On Dev Uthani Ekadashi
14 घंटे पहले
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आज (1 नवंबर) कार्तिक शुक्ल एकादशी है। इस साल तिथियों की घट-बढ़ की वजह से 2 नवंबर की सुबह भी एकादशी तिथि रहेगी। इसे देवउठनी और देवप्रबोधिनी एकादशी कहते हैं, क्योंकि आज भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागेंगे। इस दिन तुलसी और शालीग्राम का विवाह करने की भी परंपरा है। तुलसी के पास ही शालीग्राम प्रतिमा रखी जाती है। शालीग्राम एक काला चिकना पत्थर है, जिसे भगवान विष्णु का प्रतीक मानते हैं।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, जिस घर में भगवान शालीग्राम और तुलसी की पूजा एक साथ होती है, वहां विष्णु जी के साथ महालक्ष्मी का भी वास होता है, ऐसी मान्यता है। जानिए शालीग्राम से जुड़ी खास बातें…
शालीग्राम प्रतिमा को स्वयंभू यानी स्वयं प्रकट हुई प्रतिमा माना जाता है। स्वयंभू प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करने की जरूरत नहीं होती। कोई भी व्यक्ति इन्हें घर या मंदिर में स्थापित करके रोज पूजा करना शुरू कर सकता है।
शालीग्राम प्रतिमाएं कई स्वरूपों में मिलती हैं। कुछ अंडाकार होती हैं और कुछ में एक छेद भी होता है। इन प्रतिमाओं में शंख, चक्र, गदा या पद्म से निशान भी बने होते हैं।
अकेले शालीग्राम की पूजा नहीं जाती है, तुलसी के बिना इनकी पूजा अधूरी मानी जाती है।
कार्तिक शुक्ल एकादशी पर तुलसी और शालीग्राम का विवाह कराने से घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। ये विवाह करवाने से ठीक वही पुण्य मिलता है जो माता-पिता को कन्यादान करने से यानी अपनी पुत्री का विवाह करने से मिलता है।
पूजा में भगवान शालीग्राम को चंदन खासतौर पर चढ़ाना चाहिए और तुलसी के साथ मिठाई का भोग लगाना चाहिए। विष्णु पुराण में लिखा है कि जिस घर में शालीग्राम जी होते हैं, वह घर तीर्थ की तरह पवित्र हो जाता है।
शालीग्राम जी प्रतिमाएं नेपाल की गंडकी नदी से मिलती है। शालीग्राम काले रंग के चिकने, अंडाकार पत्थर को कहते हैं। पौराणिक कथा है कि नेपाल की गंडकी भी तुलसी माता का ही एक स्वरूप है।
तुलसी विवाह से जुड़ी कथा
- बहुत समय पहले जालंधर नाम का एक असुर था। उसकी पत्नी वृंदा पतिव्रता और भगवान विष्णु की भक्त थीं। वृंदा की पतिव्रता शक्ति के कारण जालंधर अजेय था, देवता भी उसे पराजित नहीं कर पा रहे थे।
- देवताओं ने भगवान विष्णु और भगवान शिव से मदद मांगी। भगवान विष्णु ने विचार किया कि जब तक वृंदा का पतिव्रत धर्म खंडित नहीं होगा, तब तक जालंधर को कोई नहीं मार सकता। इसके बाद श्रीहरि जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के सामने प्रकट हुए। वृंदा ने अपने पति को सामने देखा और अपनी पवित्रता का प्रभाव खो दिया। वृंदा पतिव्रता धर्म खंडित होने के बाद दूसरी ओर शिव जी ने जालंधर को युद्ध में पराजित कर दिया।
- जब वृंदा को यह सत्य पता चला, तो उसने भगवान विष्णु को शाप दिया कि हे विष्णु! तुमने छल से मेरे पतिव्रत का नाश किया है। मैं तुम्हें पत्थर बन जाने का शाप देती हूं और तुम भी अपने प्रिय से वियोग सहोगे। इस शाप के कारण भगवान विष्णु श्रीराम अवतार में सीता से वियोग का दुःख भोगते हैं। विष्णु जी का पत्थर स्वरूप शालीग्राम है।
- वृंदा ने फिर अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग दिए। इसके बाद देवी तुलसी के पौधे के रूप में प्रकट हुईं। भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि हे वृंदा! तुम्हारा ये रूप सदा पृथ्वी पर पूजा जाएगा। तुम्हारे बिना कोई भी मेरा पूजन पूर्ण नहीं होगा। भगवान विष्णु ने शालिग्राम रूप में तुलसी से विवाह किया था। माना जाता है कि ये घटना कार्तिक शुक्ल एकादशी को घटी थी, इसलिए आज भी इस तिथि पर तुलसी और शालीग्राम का विवाह किया जाता है।