- Hindi News
- Jeevan mantra
- Dharm
- Mahabharata Story, Makar Sankranti 2026, Uttarayan 2026, Pandavas And Bhishma Story, Life Management Tips By Bhishma
5 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

आज मकर संक्रांति और उत्तरायण है। धार्मिक मान्यता है कि उत्तरायण से देवताओं दिन शुरू होता है। द्वापर युग में महाभारत युद्ध के बाद उत्तरायण पर ही भीष्म पितामह ने प्राण त्यागे थे। इससे पहला भीष्म ने पांडवों को जीवन में सुख-शांति और सफलता पाने के सूत्र बताए थे। यहां जानिए भीष्म और पांडवों का एक किस्सा, जिसमें भीष्म ने युधिष्ठिर को राजनीति के सूत्र बताए थे।
महाभारत का युद्ध खत्म हो चुका था। पांडव विजयी हो गए थे, लेकिन इस जीत का उत्सव युधिष्ठिर के मन में नहीं था। अपने ही भाइयों, संबंधियों और गुरुओं का वध होने से वे बहुत दुखी थे।
हस्तिनापुर का सिंहासन उनका इंतजार कर रहा था, लेकिन युधिष्ठिर का मन उस सिंहासन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। उन्हें लग रहा था कि ये राज्य उन्हें सुख नहीं, बल्कि और अधिक बोझ देगा। वे स्वयं को इस जिम्मेदारी के योग्य नहीं मान रहे थे।
तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर का दुख समझा और कहा कि राजा बनना सम्मान नहीं, तपस्या है। जो लोग ये सोचते हैं कि सत्ता से सुख मिलेगा, वह भ्रम में हैं। राजतिलक के साथ संघर्ष, निर्णय, आलोचना और उत्तरदायित्व भी आते हैं। बीते हुए कल का बोझ और आने वाले कल की चिंता, दोनों को साथ लेकर चलना ही राजा का धर्म है।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुझाव दिया कि सभी पांडव और द्रौपदी भीष्म पितामह के पास जाएं। उस समय भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे थे और प्राण छोड़ने के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। श्रीकृष्ण जानते थे कि भीष्म जैसा अनुभवी और निष्पक्ष मार्गदर्शक ही युधिष्ठिर को सही दिशा दे सकता है।
जब श्रीकृष्ण, द्रौपदी और सभी पांडव भीष्म पितामह के पास पहुंचे, तो भीष्म ने श्रीकृष्ण से कहा कि मेरे शरीर में ऐसा कोई स्थान नहीं जहां तीर न हो, फिर भी आप आए हैं तो आज्ञा दीजिए।
श्रीकृष्ण ने कहा कि युधिष्ठिर राजगद्दी संभालने जा रहे हैं। कृपया इन्हें राजधर्म का ज्ञान दीजिए।
इसके बाद भीष्म ने युधिष्ठिर को शासन, न्याय, करुणा, संयम, कर्तव्य और लोक कल्याण का ज्ञान दिया। ये उपदेश केवल राजा के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए था, जो जीवन में किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी निभाता है। इसके बाद युधिष्ठिर ने राजपाठ स्वीकार किया।
प्रसंग की सीख
- जिम्मेदारी से भागें नहीं, उसे समझें
नई जिम्मेदारी डर पैदा करती है। युधिष्ठिर का विचलित होना स्वाभाविक था। जीवन में जब भी बड़ा रोल मिले- नेतृत्व, नौकरी या परिवार में, तो उस समय डर को दूर करें, बल्कि हालात को स्वीकार करके जिम्मेदारी को स्वीकार करें।
- अनुभव, ज्ञान से बड़ा होता है
श्रीकृष्ण ने स्वयं उपदेश देने के बजाय युधिष्ठिर को भीष्म के पास भेजा। ये सिखाता है कि अनुभवी लोगों का मार्गदर्शन अमूल्य होता है। जब भी किसी मुश्किल में फंसते हैं, तब हमें किसी अनुभवी से सलाह लेनी चाहिए।
- बड़ों से संवाद बनाए रखें
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हम अक्सर बुजुर्गों से मिल नहीं पाते हैं, लेकिन उनका अनुभव जीवन की कई उलझनों को सरल बना सकता है, इसलिए समय-समय पर बड़ों से मुलाकात करते रहना चाहिए।
- पद नहीं, कर्तव्य महत्वपूर्ण है
राजा होना शक्ति नहीं, सेवा है। इसी तरह जीवन में कोई भी पद- मैनेजर, माता-पिता, शिक्षक, कर्तव्य निभाने का अवसर है, अधिकार जताने का नहीं। अपने पद का अहंकार न करें, बल्कि साथियों की सेवा के लिए तैयार रहें।
- भावनाओं को दबाएं नहीं, समझें
युधिष्ठिर का दुख उन्हें कमजोर नहीं बनाता, बल्कि संवेदनशील और न्यायप्रिय बनाता है। जीवन प्रबंधन का अर्थ है कि हम भावनाओं को समझकर जीवन में संतुलन बनाएं।
- हर निर्णय का प्रभाव दूर तक जाता है
भीष्म ने राजधर्म सिखाते समय बताया था कि राजा का एक निर्णय हजारों जिंदगियों को प्रभावित करता है। यही सिद्धांत हमारे व्यक्तिगत और प्रोफेशनल जीवन पर भी लागू होता है। हमारे निर्णय परिवार, ऑफिस और आसपास के लोगों के जीवन पर असर डालते हैं, इसलिए हर एक निर्णय सावधानी से लेना चाहिए।
- सकारात्मक ऊर्जा का महत्व समझें
भले ही भीष्म शारीरिक रूप से असहाय थे, लेकिन उनकी उपस्थिति, शब्द और भावनाएं पांडवों के लिए आशीर्वाद बन गईं। सकारात्मक संगति जीवन को दिशा देती है।
- सीखते रहना ही जीवन का मूल संदेश है
जीवन में कोई भी स्थिति अंतिम नहीं होती। जो सीखना छोड़ देता है, वही पीछे रह जाता है। युधिष्ठिर ने राजा बनने से पहले सीखना चुना, यही सच्चा जीवन प्रबंधन है। हमें जीवन में लगातार सीखते रहने की आदत बनानी चाहिए।