मेडिकल की तैयारी 4 साल की उम्र से ही:साउथ कोरिया में 80% बच्चे कर रहे कोचिंग, हफ्ते में 40 घंटे ले रहे एक्स्ट्रा क्लास

Actionpunjab
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ली क्यॉन्ग मिन की जिंदगी लंबे समय तक एक ही धुरी पर घूमती रही। अपनी बेटियों को स्कूल से हागवॉन, फिर घर तक पहुंचाना। यह दिनचर्या लगभग हर माता-पिता की है, जो बच्चों को दक्षिण कोरिया की शीर्ष यूनिवर्सिटी में प्रवेश दिलाना चाहते हैं। हागवॉन, यानी निजी कोचिंग संस्थान, इस दौड़ का अहम हिस्सा हैं, जहां बच्चे मैथ, कोरियन व अंग्रेजी पढ़ते हैं ताकि कठिन एंट्रेंस में सफल हो सकें। ली ने बच्चों की पढ़ाई की खातिर विज्ञापन जगत को छोड़ दिया। पति फाइनेंस से जुड़े हैं… दोनों ने बेटियों को सबसे अच्छी कोचिंग में दाखिल करवाया। सातों दिन बाकी माता-पिता की तरह वे भी देर रात तक कैफे में बैठकर इंतजार करती थीं। उन्होंने कई बार बच्चों को कैफे में ही होमवर्क और डिनर करते फिर अगली क्लास की ओर भागते देखा। यह दृश्य उन्हें झकझोर देता था, क्योंकि यह शिक्षा व्यवस्था बच्चों की मासूमियत व परिवार की शांति दोनों को निगल रही थी। द. कोरिया में 80% स्कूली बच्चे किसी न किसी रूप में कोचिंग लेते हैं। सरकारी डाटा के अनुसार, 2024 में यह बाजार 1.84 लाख करोड़ रु. तक पहुंच गया। सियोल के कुछ इलाकों में तो 4 साल के बच्चों को इंग्लिश प्री-स्कूल के लिए एंट्रेंस टेस्ट देना पड़ता है। 2013 में ली ने अपनी बेटियों को 4 और 5 साल की उम्र में इंग्लिश प्री-स्कूल में प्रवेश दिलवाया। फिर उन्हें गंगनम के डैची इलाके के हागवॉन भेजा, जहां 1,200 कोचिंग सेंटर हैं। यहां प्रवेश से पहले ‘टेस्ट’ देना पड़ता है। दिमाग तेज करने का दावा कर रहे क्लिनिक सियोल में पढ़ाई का दबाव साफ दिखता है। यहां ऐसे स्टडी कैफे हैं जहां छात्रों के फोन जब्त कर लिए जाते हैं ताकि वे ध्यान से पढ़ सकें। कुछ क्लिनिक दिमाग तेज करने वाले इलाज का दावा करते हैं। सड़कों पर ‘थेरेपी जोन’ साउंडप्रूफ केबिन बने हैं, जहां छात्र शांति से पढ़ सकते हैं या चीखकर तनाव निकाल सकते हैं। सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर किम डोंग-सु कहते हैं, हागवॉन पर टिकी शिक्षा प्रणाली बच्चों व समाज दोनों के लिए खतरनाक है। इसका नतीजा मानसिक दबाव व आत्महत्या की घटनाओं में बढ़ोतरी है। वे मानते हैं कि शिक्षा सिर्फ परीक्षा के नतीजों तक सीमित न रहे।
तीसरी क्लास की मैथ्स कोचिंग के लिए इतना संघर्ष रहता है कि कोचिंग की मदद लेनी पड़ती है। एक कहावत भी है- अगर बच्चे को मेडिकल कॉलेज भेजना है, तो उसे हाई स्कूल तक का मैथ्स छह बार पढ़ाना होगा। एक कोचिंग संचालक बताते हैं,‘उनके यहां प्राइमरी स्कूल के बच्चे हफ्ते में 40 घंटे एक्स्ट्रा क्लास करते हैं। दबाव इतना है कि 6 साल की बच्ची ने निबंध में लिखा कि वह अच्छा नहीं कर पाई, तो पूरा परिवार दुखी हो जाएगा। बच्ची की मां पार्क यूना कहती हैं,‘बेटी की साथी ने आत्महत्या कर ली क्योंकि वह शीर्ष मैथ्स हागवॉन में प्रवेश नहीं ले सकी। इसके बाद पार्क ने तय किया कि उनके बच्चे कॉलेज नहीं भी जाना चाहें, तो कोई बात नहीं। ली की बड़ी बेटी साहित्य में तेज थी, पर मैथ में कमजोर। कोरियन शिक्षा प्रणाली में मैथ में कमजोर छात्र को दोयम दर्जे का समझा जाता है। ध्यान हमेशा कमजोरी पर रहता है। इससे बच्चों का आत्मसम्मान प्रभावित होता है। इधर, ली ने बेटियों को अमेरिकी बोर्डिंग स्कूल भेज दिया ताकि वे दबाव में न रहें। हालांकि वे मानती हैं कि यह विकल्प सबके पास नहीं होता। बेटियां वहां खुश हैं। बड़ी बेटी, जिसे मैथ में कमजोर माना जाता था, वहां ‘जीनियस’ कहलाती है। वह अब मनोवैज्ञानिक हैं और हागवॉन में उलझे माता-पिता व बच्चों को दबाव से उबरने में मदद करती हैं।

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