राजा ने तवायफ की बेटी को दी थी रसकपूर उपाधि:स्वरों में मिठास और सुंदरता में सुगंध, इसलिए रसकपूर कहलाई

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प्रेम पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहुत नाहिं। रहिमन मैन-तुरंग चढ़ि, चलिबो पाठक माहिं।। वैलेंटाइन डे यानी प्रेम के प्र​तीक का खास दिन। इस अवसर पर कवि रहीम की इन दो लाइनों में प्रेम का पूरा सार है। प्रेम का मार्ग कठिन है, हर कोई नहीं निभा पाता। जो मन रूपी घोड़े को साधकर आग जैसे पथ पर चलता है, वही सच्चे प्रेम को पाता है। इस बात के जरिए हम आज जयपुर की चर्चित प्रेम कहानी का जिक्र कर रहे हैं। रसकपूर का जन्म ही प्रेम से शुरू हुआ। खुद भी प्रेम के परवान में पूरी सम​ाहित हो गई। जयपुर राजपरिवार से जुड़े विद्वान पं. शिवनारायण मिश्र और तवायफ नूरी बेगम की बेटी थी रसकपूर। प्रेम कहानी भी सांगानेरी गेट पर बने तवायफों के कटले कांचमहल में परवान चढ़ी। खास बात यह कि जगतसिंह की मुलाकात बसंत पंचमी को चंद्रमहल में रसकपूर से हुई थी और होली तक जाते-जाते पूरी तरह परवान चढ़ी। राजा जगत सिंह (1803-1818) का राज रहा। वे महाराजा प्रताप सिंह के पुत्र थे। मुलाकात: सिटी पैलेस के चंद्रमहल में पहली बार देखा महाराजा जगतसिंह ने रसकपूर को पहली बार बसंत पंचमी पर जयपुर के चंद्रमहल (सिटी पैलेस) में देखा था और उन्हें दिल दे बैठे। उन्होंने रसकपूर को न केवल रानी का दर्जा दिया, बल्कि ‘कपूर’ का खिताब देकर जयपुर की रानी जैसी प्रतिष्ठा प्रदान की। रसकपूर को दिया गया यह सम्मान जयपुर के राजदरबारी सामंतों को रास नहीं आया, क्योंकि वे एक तवायफ थीं। जब जगतसिंह गंगोली के युद्ध (गंगोली वाले से लौटते समय) में व्यस्त थे, तब चौमूं के सामंत ने रसकपूर को गिरफ्तार कर नारगढ़ किले में कैद कर दिया। साहित्यकार आनंद शर्मा की रचना रसकपूर के अनुसार, राजा के प्रेम में डूबी रसकपूर को उनकी मृत्यु के बाद ही कारागार से मुक्ति मिली, जो इस ऐतिहासिक प्रेम कथा का दुखद अंत था। जब प्रेम अपने चरम पर था, तब आमेर महल से छन-छन कर आती उनकी कहानियां गलियों में लोगों की रसीली जुबान पर गूंजा करती थीं। एक समय ऐसा भी आया जब राजा जगतसिंह रसकपूर के बिना एक पल भी नहीं रह पाते थे। शासन की सुध लेने की गुजारिश पर उन्होंने कहा कि चंद्रमहल आऊंगा पर रसकपूर साथ रहेगी। समर्पण : रसकपूर ने खुद को समाप्त कर लिया समर्पण ऐसा कि जगतसिंह के प्रवास में रसकपूर ने साहस से जयपुर को दुश्मनों के हमले से बचाया। इस बीच पटरानी और दूसरी रानियों ने षड्यंत्र किए। जगतसिंह को मजबूरीवश रसकपूर को कालकोठरी में डालना पड़ा, पर सच्चाई सामने आने पर जब वे उन्हें लेने पहुंचे, तो रसकपूर नहीं आईं। जगतसिंह की हत्या के बाद रसकपूर ने स्वयं को समाप्त कर प्रेम के प्रति अपना गहरा समर्पण साबित किया। दी हाफ इंप्रेस की लेखिका तृप्ति पांडे बताती हैं कि रसकपूर और महाराजा सवाई जगतसिंह का मिलना, उसका सौंदर्य और कला पर मुग्ध होना तो आम बात थी, पर ‘अर्धराजन’ की पदवी ने इस संबंध को खास बना दिया। आकर्षण से शुरू यह रिश्ता रसकपूर ने समर्पण और गरिमा में ढाला। दीवानगी : आमेर महल में मिलने की थी जिद कहते हैं राजा की रोज सुबह चंद्रमहल में भैरवी के आलाप सुनकर ही नींद खुलती थी। उस समय सांगानेरी गेट के पास स्थित फल मंडी की मशहूर तवायफ पारो जो सिटी पैलेस के गुणीजन खाने में काम करती थी, रोज भैरवी सुनाकर राजा को नींद से जगाती थी। भैरवी के बोल थे – रैन बिहानी जागो रे सांवरे। एक दिन तवायफ अपने साथ नवयौवना रसकपूर को ले गई। जैसे ही रसकपूर ने भैरवी सुनाई तो राजा उठकर बाहर आए और एकटक रसकपूर को देखने लगे। बस यहीं से शुरू हो गई यह कहानी। राजा को वह इतनी पसंद आई कि उन्होंने हुक्म दिया कि रसकपूर से उनकी मुलाकात आमेर महल में कराई जाए। इसके बाद दीवानगी का आलम जगत सिंह के सिर ऐसा चढ़ा कि रसकपूर को आधा राजपाट दे दिया। जयपुर की रियासत में रसकपूर के नाम के सिक्के ढलवाए गए। पोथीखाना और सूरतखाना भी उसके नाम कर दिया गया। रसकपूर की उपाधि क्याें मिली? वह इतनी सुंदर और आकर्षक थीं कि जगतसिंह ने उन्हें यह उपाधि दी। इसमें रस का अर्थ- मिठास और कपूर का मतलब- सुंगध से था। इलेस्ट्रेशन : संजय डिमरी

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