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हरिद्वार12 घंटे पहले
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अभी अधिक मास चल रहा है, इस महीने में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की कथाएं पढ़ने-सुनने की परंपरा है। यहां जानिए श्रीकृष्ण का एक ऐसा प्रसंग, जिसमें उन्होंने भीम को धृतराष्ट्र से बचाया था, वर्ना भीम की मृत्यु हो सकती थी। जानिए प्रसंग…
महाभारत में युद्ध के अंतिम चरण में भीम और दुर्योधन के बीच गदा युद्ध हुआ। माता गांधारी की दिव्य शक्ति की वजह से दुर्योधन का ऊपर का शरीर वज्र की तरह कठोर बन गया था, लेकिन कमर के नीचे का हिस्सा सामान्य ही था। गदा युद्ध का ये नियम था कि योद्धा एक-दूसरे पर कमर के नीचे वाले हिस्से पर प्रहार नहीं कर सकते थे, लेकिन भीम ने दुर्योधन की जांघ पर गदा से प्रहार किया, जिससे वह गंभीर घायल हो गया और फिर उसकी मृत्यु हो गई।
दुर्योधन वध के बाद सभी पांडव श्रीकृष्ण के साथ धृतराष्ट्र से मिलने पहुंचे थे। धृतराष्ट्र अंधे थे, लेकिन वे बहुत शक्तिशाली थे। ऐसा माना जाता है कि धृतराष्ट्र में कई हाथियों के समान बल था यानी वे भीम से भी ज्यादा बलवान थे। एक बार उनकी पकड़ में कोई आ जाए, तो उसे वे जीवित नहीं छोड़ते थे। दुर्योधन की मृत्यु से धृतराष्ट्र इतने दुखी और गुस्से में थे कि वे भीम को डालना चाहते थे।
श्रीकृष्ण के साथ युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव धृतराष्ट्र के सामने पहुंचे, तो सभी एक-एक करके धृतराष्ट्र को प्रणाम कर रहे थे और धृतराष्ट्र सभी को गले लगा रहे थे। श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र के मन की बात पहले से ही समझ गए थे कि वे भीम को मारना चाहते हैं। जब धृतराष्ट्र ने भीम को गले लगाने की इच्छा जताई तो श्रीकृष्ण ने तुरंत ही भीम के स्थान पर भीम के आकार की एक लोहे की मूर्ति आगे बढ़ा दी।
धृतराष्ट्र ने गुस्से में उस लोहे से बनी मूर्ति को दोनों हाथों से ऐसा दबोचा कि मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े हो गए। मूर्ति तोड़ने की वजह से उनके मुंह से भी खून निकलने लगा और वे जमीन पर गिर गए। कुछ ही देर बाद जब उनका क्रोध शांत हुआ तो उन्हें लगा कि भीम मर गया है, इससे दुखी होकर वे रोने लगे। धृतराष्ट्र को अपने किए पर पछतावा हो रहा था। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि महाराज भीम अभी जीवित है, आपने जिसे तोड़ा है, वह तो भीम के आकार की एक मूर्ति थी। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने भीम के प्राण बचा लिए।
कैसे हुई धृतराष्ट्र और गांधारी की मृत्यु
युद्ध के बाद युधिष्ठिर राजा बने। इसके बाद धृतराष्ट्र और गांधारी भी पांडवों के साथ ही रहने लगे। कुंती इन दोनों का ध्यान रखती थीं, लेकिन भीम धृतराष्ट्र ताने मारते रहते थे। करीब 15 सालों तक ऐसे ही चलता रहा। एक दिन धृतराष्ट्र और गांधारी ने वानप्रस्थ यानी वन में तप करने का निश्चय किया और महल से वन की ओर चल गए। कुंती ने भी इन दोनों के साथ चली गईं।
इन तीनों के वन में जाने के करीब 3 साल बाद देवर्षि नारद युधिष्ठिर के पास पहुंचे। नारद मुनि ने युधिष्ठिर को बताया कि धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती हरिद्वार में रहकर तपस्या कर रहे थे, उस समय एक दिन वन में आग लग गई। दुर्बलता के कारण धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती आग से बचने के लिए भाग नहीं सके और उस आग की वजह से तीनों की मृत्यु हो गई। ये समाचार सुनने के बाद पांडवों ने विधिपूर्वक तीनों का श्राद्ध कर्म करवाया।
